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Saturday, December 19, 2009

वक़्त नहीं

हर ख़ुशी है लोगों के दामन में
पर एक हंसी के लिए वक़्त नहीं
दिन रात दौड़ती दुनिया में
ज़िन्दगी के लिए है वक़्त नहीं

टीवी के सीरियलों में सिमटा पड़ा है बचपन
अब दादी नानी के किस्से - कहानियों के लिए वक़्त नहीं
भूख भी मांगे है अब पिज्जा बर्गेर और चौमिन
कढ़ी चावल / झूरी चटनी अंचार के लिए वक़्त नहीं

माँ की लोरी का एहसास तो है
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं
जिस पिता के कंधे चढ़ थी दुनियां देखी
उन कन्धों को कंधे देने का वक़्त नहीं

उम्मीद रखते हैं सब से बड़ी बड़ी
पर रिश्ते निभाने का है वक़्त नहीं
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं

सारे दोस्त मोबाइल में हैं
पर दोस्ती के लिए है वक़्त नहीं
गैरों की क्या बात करें
जब अपनों के लिए है वक़्त नहीं

आँखों में है नींद बड़ी
पर सोने का भी है वक़्त नहीं
दिल हैं ग़मों से भरा हुआ
पर रोने का भी है वक़्त नहीं

पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े
की थकने का भी है वक़्त नहीं
पराये एहसास की क्या क़द्र करें
जब अपने सपनों के लिए है वक़्त नहीं

तू ही बता ए ज़िन्दगी
इस ज़िन्दगी का क्या होगा
की हर पल मरने वालों को
जीने के लिए भी है वक़्त नहीं

राज रंजन